अपने दैनिक जीवन में आपको भी नित नई समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिसके लिए आप तत्काल कुछ न कुछ उपाय निकाल कर उससे मुक्त भी हो जाते हैं। तत्काल आपको जो राहत मिलती है, मजे की बात ये है कि इसके लिए आपको बहुत ज्यादा संसाधन भी खर्च नहीं करने होते हैं। अपने आस पास उपलब्ध संसाधनों से ही काम बन जाता है। आप इस जुगाड़ तकनीक से तैयार पर्यावरण अनुकूल आविष्कारों के बारे में बताते हैं जो देश के अलग अलग जगहों में किसानों के बीच खासे लोकप्रिय हैं और उनकी जरूरत के लिहाज से उपयोगी भी।

एडीर – पारिस्थितिकी के अनुकूल मछली पकड़ने का जाल

मछली पालन देश के कई इलाकों में प्राथमिक व्यवसाय है और देश की एक बड़ी आबादी इस पर निर्भर है। यहां तक की Bamboo-fish-trap-176x300दूरदराज़ के इलाकों में भी नदियों और विभिन्न जल स्त्रोतों में मछली पकड़ने से भोजन और अन्य संसाधनों की जरूरी आवश्यकता पूरी होती है। पूर्वोत्तर भारत के अरूणाचल प्रदेश में रहने वाली गालो जनजाति कई तरीकों से मछली पकड़ने में माहिर है। कबीले में मछली पकड़ने के लिए प्रयोग किए जाने वाले तरीके और औजार पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल हैं। गालो जनजाति में मछली पकड़ने के लिए सर्व उपलब्ध बांस से बने एडीर उपकरण बड़े लोकप्रिय हैं।
नदी की धारा में बह रही मछलियों को पकड़ने के लिए बड़ी कुशलता से बनाया गया एक टोकरीनुमा जाल है एडीर। शंक्वाकार बांस से बने इस जाल का इस्तेमाल आम तौर पर गर्मियों में होता है जब नदी की धारा में पानी का बहाव मद्दम होता है। मछली पकड़ने का ये तरीका जलीय जीवन को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है क्योंकि मछली पकड़ने के इस तरीके में न तो किसी तरह के हानिकारक रासायनों का उपयोग होता है और न ही केंचुए का नुकसान होता है। नदी में पानी के अन्य निकासी को बंद करके पानी के एकमात्र बहाव की दिशा में इस टोकरी को फंसा दिया जाता है ताकि पानी के साथ बह कर आ रही मछलियां इस टोकरी में आकर फंस जाएं। गोला जनजाति इस अभिनव टोकरी को बना कर बेचती भी है जिससे उन्हें ठीक ठाक आय हो जाती है।

गेंदे के बेकार पौधों से तेल निश्कर्षण

गेंदे के फूल से निकले तेल में विभिन्न औषधीय गुण होते हैं। सुगंधित पीले फूल का इस्तेमाल जहां तेल निकालने के लिए होता है, वहीं फसल कटने के बाद गेंदे का शेष बचा पुरा पौधा बेकार चला जाता है। कानपुर के एक गांव में हाईस्कूल पढ़ाई बीच में छोड़ देने वाले किसान समर सिंह भादौरिया ने कुछ अलग ढंग से सोचते हुए गेंदे के तने से भी तेल निकालने का विचार किया। वो अपने खेत में गेंदे से फूल को तोड़ने के बाद पुरे पौधे का इस्तेमाल तेल निकालने के लिए करने लगे। प्रत्येक एक टन प्रसंस्कृत गेंदे के पौधे से वो दो से ढाई किलो तेल निकालने में सफल रहे। परिणाम से आश्चर्यचकित हो उन्होंने तेल की शुद्धता की परख के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह ली।

Marigold-Flower-Oil-300x207
परिणाम से प्रेरित होकर भादौरिया ने एक टन क्षमता वाली दो औऱ प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित कीं। इस प्रक्रिया के तहत गेंदे के पौधों का तेल के लिए इस्तेमाल तब होता है जब पौधों में फूल लगने बंद हो जाते हैं। तेल निकालने की इस तकनीक में गेंदे के पौधों के उन हिस्सों, पत्तियों और तना को अतिरिक्त आय का साधन बनाया जाता है जिनको पहले अपशिष्ट कचरा समझ कर फेंक दिया जाता था। इस प्रक्रिया से तेल निकालने के बाद भी बचे हुए अपशिष्ट प्रसंस्कृत सामग्री का उपयोग अन्य फसलों के लिए जैविक खाद या पलवार सामग्री (MULCHING Material) के रूप में उपयोग किया जाता है।

हालोदु : पहाड़ी किसानों के लिए वरदान

Halodu-weederपहाड़ों के ढलान और खेतों के बिखरे पैटर्न में किसान बुआई आदि के लिए बड़े पैमाने पर ट्रेक्टर का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। उप हिमालयी पर्वत श्रेणी की जलवायु जो बड़ी तेज़ी से बदलती है उनकी मुश्किलों को और बढ़ा देती है। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के एक दूरवर्ती गांव के निवासी राजकुमार जो इन प्राकृतिक आपदाओं के एक भुक्तभोगी थे। इन आपदाओं ने उन्हें कुछ नया करने की प्रेरणा दी। अपनी पुरानी साइकिल के एक पहिये और चिमटे की मदद से राज कुमार ने अपने खेतों में बुआई और निराई के लिए एक अजीब सी दिखने वाली लेकिन सरल उपकरण का आविष्कार किया। हाथ से चलने वाली इस निराई मशीन हालोदुकी मदद से जल्द ही इन पहाड़ी इलाके में रहने वाले कई ऐसे किसानों के जीवन में बदलाव आएगा
हालोदु न केवल मक्के की निराई के लिए उपयोगी है बल्कि एक पंक्ति में मक्के की बुआई के साथ साथ किचन गार्डन में बोए जाने वाले पालक, सरसों और धनिया की बुआई के लिए भी उपयोगी है। किसान आमतौर पर मक्के में अंतर-फसल संचालन के लिए मसौदा शक्ति ( Draft Power ) का आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं। बैल हल का कम होता उपयोग और पहाड़ी इलाकों में ट्रेक्टर के सीमित उपयोगिता को देखते हुए कुछ कम लागत वाली तकनीक की आवश्यकता थी इन इलाकों में। हालोदु न केवल कम खर्च में किसानों की सहायता करने वाला उपकरण है बल्कि ट्रेक्टर से निकलने वाले हानिकारक ग्रीन हाउस गैसों की तुलना में प्राकृतिक परिदृश्य के संरक्षण के लिहाज से भी हालोदु उपयोगी है।

कृषि के लिए आला (स्टेथोस्कोप )

स्टेथोस्कोप का इस्तेमाल आम तौर पर इंसानों और जानवरों के दिल की धड़कन का पता लगाने के लिए किया जाता है। ओडिसा के बारगढ़ जिले के चक्रधर प्रधान ने इस औजार का कृषि कार्यों के लिए एक नए उपयोग की खोज की। स्टेथोस्कोप की मदद से पौधे के भीतर जड़ को खोखला कर देने वाले कीट का पता लगाया जा सकता है। पौधे के बाहरी हिस्से में स्टेथोस्कोप लगाने से कीट के काटने की आवाज को बखुबी सुना जा सकता है। थोड़े से ध्यान और धैर्य से इसको सुना जा सकता है। तदनुसार प्रभावित पौधों में कीट की पहचान के बाद जड़ को उखाड़ने, मिट्टी में कीटनाशक डालने जैसे आवश्यक कार्य किए जा सकते हैं। Stethoscope-agriculture
स्टेथोस्कोप का उपयोग पौधों में जड़ नष्ट करने वाले कीट का पता लगाने के लिए किया जाता है। जैसा कि एक स्टेथोस्कोप काफी सस्ता ( मात्र 400 रूपये ) है, आसान से इस्तेमाल किए जा सकने योग्य है, किसान आसानी से इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। किसानों को निश्चित रूप से इससे फायदा होगा। वे आसानी से स्टेथोस्कोप की मदद से पौधों में कीटों का पता लगा सकते हैं ताकि उसको समय रहते नियंत्रित किया जा सके।

COMMENTS