महाराष्ट्र में आम से लेकर हरियाणा में गेंहूं और कश्मीर में सेब तक, देश भर में जलवायु परिवर्तन ने फसलों के उत्पादन को बुरी तरह से प्रभावित किया है। कम बारिश की परेशानी से किसानों में बढ़ते आत्महत्या की प्रवृति को देखते हुए कृषि विशेषज्ञ लगातार किसानों से नई तकनीक और अपनी खेती को बेहतर करने के लिए कुछ अलग हटकर सोचने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मजे कि बात ये है कि देश भर में कुछ किसान ऐसा कर भी रहे और उन्हें इसके बेहतर नतीजे भी मिल रहे हैं।

कभी सेब के बागों और धान की खेती के लिए जाना जाने वाला कश्मीर आज पश्चिमी महाराष्ट्र की प्रमुख फसल रही स्ट्राबेरी उपजा रहा है। रेतिले राजस्थान का गांव आज सागौन के उंचे पेंडों का घर बन रहा है। मध्य प्रदेश का एक फार्म दुनिया भर के कृषि विशेषज्ञों को प्राकृतिक खेती का गुर सिखा रहा है – ऐसी खेती जिसमें जैविक खेती की तरह सिर्फ प्राकृतिक सामग्रियों का ही इस्तेमाल किया जाता है — यहां तक की जैविक उर्वरकों और कीटनाशकों तक का भी उपयोग नहीं किया जाता। तमिलनाडु का एक किसान जो पहले प्रबंधन की कंसेल्टेंसी देते थे आज मेट्रो शहरों की रेस्तराओं में परोसे जाने वाले विदेशी गोभी और पालक की विदेशी प्रजाति, जलीय खेती की नई तकनीक से उपजा रहे हैं। पंजाब में ग्लाडियोलस के फूल उपजाए जा रहे और व्हाट्सअप में ग्रुप बनाकर उसे बेचा भी जा रहा है।

मुंबई के इंदिरा गांधी इन्स्टीच्युट ऑफ डेवलेपमेंट रिसर्च में प्रोफेसर और कुपोषण एवं खेती की विशेषज्ञ सुधा नारायण इस प्रवृति की ओर इशारा करते हुए कहती हैं कि किसानों को हाल के दिनों में मिल रही चुनौतियों को खेतों में नई नई तकनीकों के सहारे व्यक्तिगत स्तर पर लड़ने की ये प्रवृति देश भर में अलग अलग किसानों में देखी जा सकती है। नारायणन कहती हैं “पारंपरिक फसलों से होने वाली कम आमदनी, सीमांत औऱ छोटे जोत और बेकार भूमि बाजारों, जलवायु परिवर्तनों की वजह से बढ़ रही चुनौतियों, अस्थिर और अप्रत्याशित बाज़ार कुछ ऐसी चुनौतियां हैं जिनका किसानों को सामना करना पड़ रहा है। एक हद तक आप इसे कृषि को टिकाऊ विकास के रास्ते पर ला पाने में नीति निर्माताओं की असफलता के बरक्स किसानों की प्रतिक्रिया के रूप में भी देख सकते हैं।”

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