पंजाब में पटियाला जिले के मंजाल खुर्द गांव के रहने वाले 38 साल के एस. गुरप्रीत सिंह युवा हैं, पेशे से किसान हैं। ये शायद गुरप्रीत सिंह का बेहद साधारण परिचय होगा। दरअसल गुरप्रीत की शख्सियत को देखते हुए ये कहना ज्यादा उचित होगा कि वो ‘आलीशान किसान’ हैं।

इससे पहले की हम गुरप्रीत सिंह की खेती किसानी पर बात आगे बढ़ाएं.. एक नज़र डालते हैं इस आलीशान किसान के व्यक्तित्व पर रौब दाब पर। अगर आप पटियाला जिले के मंजाल खुर्द गांव आते हैं और आपको अपने फार्म में दूर दूर तक नज़र आने वाली फुलों की क्यारियों के बीच करीने के सूट, चमचमाते बूट और गोगल्स में कोई किसान नज़र आए तो आपको शायद ये स्वीकार करने में भी हिचक होगा कि सामने वाला व्यक्ति कोई किसान है। जी हां, ये पंजाब के ‘मार्डन किसान’ हैं जिन्होंने अपने जोखिम लेने के साहस से आज खेती किसानी को एक नयी दिशा देने में कामयाबी पाई है।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग के डिप्लोमाधारी गुरप्रीत ने खेती को नौकरी पर वरीयता दी। उनके परिवार में साढे चौदह हेक्टेयर जोत की खेती है। गुरप्रीत ने भी आम किसानों की तरह खेती की शुरूआत पारंपरिक तरीके धान-गेंहू उपजाने से की। वैज्ञानिक सोच के धनी गुरप्रीत को पारंपरिक तरीके की इस खेती से होने वाली बंधी बंधाई आय से संतुष्टि नहीं मिली। दरअसल गुरप्रीत ने अपने मैकेनिकल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा पर खेती को वरियता यूं ही नहीं दी थी। वो धान गेंहू उपजाने के अलावा भी कुछ अलग करना चाहते थे।

लगातार अन्य किसानों, वैज्ञानिकों से मेल मुलाकात और कई जगहों पर घुम घुमकर जुटाई जानकारी के बाद उन्होंने बागवानी में हाथ आजमाने की ठानी। आज वो ग्लाडियोलस, गुलाब, गेंदा, गुलज़ाफरी की खेती करते हैं, साथ ही वर्मीकल्चर और मत्स्यपालन के अलावा धान और गेंहू के बीज उत्पादन में भी लगे हुए हैं। इलाके में ग्लाडियोलस जैसे फुलों की खेती आम तौर पर नहीं होती रही है। यही वजह है कि इलाके में ग्लाडियोलस की खेती के लिए वैज्ञानिक तौर तरीकों का भी विकास नहीं हो पाया।

ग्लाडियोलस की खेती में फुलों के बल्ब की खुदाई और उसे बीजों के तौर पर बेचने के लिए उसकी ग्रेडिंग करना श्रम और समय साध्य काम है। इलाके में इस तरह की अपारंपरिक खेती को बढ़ावा देने के मकसद से गुरप्रीत ने इनकी खेती में काम आ सकने वाले कई मशीनें भी तैयार की हैं। मसलन ग्लाडियोलस की खेती को देखते हुए इसके फुलों से बल्ब को अलग करने के लिए उन्होंने ग्लाडियोलस डिग्गर तैयार किया। इस ग्लाडियोलस डिग्गर को आसानी से ट्रेक्टर के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है।

gur family

यही नहीं फुलों के बल्बों को गुरप्रीत बीजों के तौर पर बेचते भी हैं। इन बल्बों की हाथ से की जाने वाली ग्रेडिंग में पहले हफ्तों तक समय लगता था। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए गुरप्रीत ने ग्लाडियोलस ग्रेडर मशीन ही तैयार कर दी जिसमें एक बार में बल्बों के चार अलग अलग माप में श्रेणीकरण संभव है। ऐसा करने में फुलों को भी कोई नुकसान नहीं होता है। इस मशीन की ग्रेडिग क्षमता 7-8 क्वींटल प्रति घंटे की है और कीमत महज़ तीस हज़ार रूपए। यही नहीं गुरप्रीत ने गुलाब जल तैयार करने के लिए भी एक संयंत्र लगा रखा है। वैसे गुलाब जो बेचे नहीं जा सके किन्हीं कारणों से या जरूरत से ज्यादा उत्पादन होने पर उन्हें गुलाब जल बनाने के काम में ले लिया जाता है। मैक्निकल इंजीनियर गुरप्रीत ने इसके साथ ही राष्ट्रीय बागवानी मिशन के दिशा निर्देशों के अनुरूप वर्मीन कंपोस्ट इकाई भी लगा रखी है। अपने खेतों की जरूरत पूरी करने के अलावा वो संयंत्र में बनने वाले वर्मीन कंपोस्ट को विभिन्न पैकिंग में बाज़ार में बेचते भी हैं। गुलाब जल और वर्मीन कंपोस्ट दोनों को बाज़ार में बाल्सन ट्रेड मार्क के नाम से बेचा जाता है।

हाल ही में दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने पिछले सप्ताह ही गुरप्रीत सिंह शेरगिल को खेती के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कार्य को देखते हुए फैलो फारमर अवार्ड से सम्मानित किया है। उच्च स्तर की बागवानी और प्रसंस्करण के लिए देश के कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने गुरप्रीत को इस सम्मान से नवाजा।

gur 3

पंजाब के युवा कृषकों के लिए नज़ीर बन चुके गुरप्रीत ने पारंपरिक शैली की खेती को छोड़ अपनी खेती में में विविधता पैदा करने का ज़ोखिम उठाया। पारंपरिक खेती से इतर बागवानी और प्रसंस्करण को गुरप्रीत ने अपनी खेती का मूल मंत्र बनाया। अपने पिता बलदेव सिंह और बड़े भाई करमजीत सिंह के सहयोग से गुरप्रीत ने सन 1996 में गेंदे की खेती शुरू की थी। उसके बाद पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों और पंजाब के बागवानी विभाग के दिशा निर्देशन में गुरप्रीत ने जल्द ही अपने 22 एकड़ के खेत में ग्लाडियोलस, सामान्य गुलाब, इंग्लिश गुलाब, गुलज़ाफरी लेवेंडर आदि फुलों की खेती शुरू की। इसके साथ ही उन्होंने तकरीबन एक एकड़ खेत में कट रोजेज़ की संरक्षित खेती भी शुरू की।
गुरप्रीत की हाइटेक खेती में आज एक शीत गृह, ग्लाडियोलस, गुलाबों के लिए एक संरक्षण गृह, गुलाब, एलुवेरा, और अमला के लिए प्रसंस्करण इकाई जुड़ चुके हैं। वो अपने उत्पाद मसलन गुलाब शर्बत, एलुबेरा, आंवला जूस की बिक्री भी करते हैं।

गुरप्रीत को खेती किसानी के क्षेत्र में अपने अभिनव और साहसिक प्रयोगों के लिए राज्य सरकार ने पंजाब मुख्यमंत्री अवार्ड (2011), जगजीवन राम इनोवेटिव फार्मर अवार्ड (2012), प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से एन जी रंगा किसान अवार्ड (2014) और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की ओर से दिया जाने वाला इनोवेटिव फार्मर अवार्ड (2015) से सम्मानित किया जा चुका है।

गुरप्रीत को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने अपने राष्ट्रीय परामर्श पैनल में भी शामिल किया है। गुरप्रीत ने नए अंदाज़ में खेती को गढ़ा है। लिहाज़ा इसकी गुंज भी दूर दूर तक सुनाई दे रही है। हाल ही में अफ्रीकी देशों का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे उनकी खेती के टिप्स लेने उनके गांव पहुंचा। इस प्रतिनिधिमंडल में पश्चिम अफ्रीकी देश जांबिया के राष्ट्रपति की बेटी अज़ी मारियम सहित कुल बारह सदस्य मौजुद थे। गुरप्रीत के खेती के तौर तरीकों ने इन अफ्रीकी मेहमानों को खासा प्रभावित किया।

 

COMMENTS