मध्यप्रदेश में इंदौर से तकरीबन 130 किलोमीटर की दूरी पर नर्मदा के किनारे, जहां तक आपकी नजर पहुंचती है, फैला है कृषि तीर्थ, जैविक खेती के प्रति उत्साही लोगों के लिए यह किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है।

आखिर क्या खास है इस फॉर्म में फॉर्म के मालिक, साठ वर्षीय दीपक सुछेद बताते हैं इस फॉर्म से ज्यादा, खेती करने का तरीका महत्वपूर्ण है। हम इसे NatuEco विज्ञान कहते हैं जिसका मतलब है खेती करने का प्राकृतिक औऱ पर्यावरण अनुकूल तरीका। ये जैविक खेती से अलग है क्योंकि हम तो जैविक खाद और जैविक कीटनाशक तक का भी इस्तेमाल नहीं करते।

इन दिनों जैविक खेती, जिसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता है, लोकप्रिय हो रहा है। लेकिन सुछेद जैसे कुछ कृषक एक कदम और आगे बढ़कर प्राकृतिक कृषि कर रहे हैं। इसमें बहुफसलीय पैटर्न और बायोमास का इस्तेमाल करके मिट्टी को समृद्ध किया जाता है। इज़रायल, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और ब्रिटेन जैसे देशों से छात्र सहित तकरीबन 500 लोग प्रतिवर्ष कृषि तीर्थ का दौरा करते हैं।

गुजरात के मूल निवासी सुछेद ने दशकों तक महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में खेती करने के बाद 2006 में मध्य प्रदेश पहुंच बाजवाड़ा गांव में तकरीबन आधे एकड़ में फैले इस फॉर्म की स्थापना की जो आज कम से कम 135 से अधिक फसलों, सब्जियों, फलों, मसालों और जड़ी बूटियों का घर बन चुका है। सुछेद यहां घुमने आने वालों को फॉर्म की मिट्टी को हाथ में लेकर सुंघ कर उसकी संरचना को समझने का आग्रह करते हुए कहते हैं, फॉर्म में कुछ भी खास नहीं है सिवाय इसकी मिट्टी के जिसे न तो जोता ही गया और न ही कभी खोदा ही गया। बीच बीच में बायोमास – बचे हुए पत्ते और फसल कटने के बाद खेत में बची हुई फसल की खुंटी को कुचलकर मिट्टी की पोषक तत्वों की भरपाई के लिए मिला दिया जाता है। आप यहां खुद देख सकते हैं कि किस तरह एक बंजर भूमि को इतने हरे भरे खेत में औऱ आत्मनिर्भर बायोमास उत्पादक के तौर पर तब्दील किया गया है। भोपाल में भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान के निदेशक अशोक पात्रा कहते हैं — दीपक सुछेद का ये प्राकृतिक खेती बेहतरीन है और इसे देश के हर कोने में फैलाया जाना चाहिए।

(अंग्रेजी दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स से साभार)

COMMENTS