मांड्या के एक ऑर्गेनिक स्टोर में एक किसान अपने साथ लाए टमाटर और मिर्च से भरे बोरे को सामने पड़े टेबल पर रखता है। लाए गए टमाटर का वजन साढ़े चार किलो और मिर्च तकरीबन सवा किलो है। कैशियर इन फसलों का वजन कर किसान को उसका मूल्य दे देता है। अपने जेब में पैसे रख कर वह किसान स्टोर से बाहर निकल जाता है। ये पूरी प्रक्रिया छह मिनट से भी कम वक्त में पूरी हो जाती है। झ़ट पट निपट गए पूरी प्रक्रिया में न तो मोल भाव हुआ न ही किसी बिचौलिये की ज़रूरत महसूस हुई, लिहाज़ा असंतुष्टि का तो सवाल ही नहीं उठता।

लेकिन साल भर पहले तक मंड्या में हालात ऐसे नहीं थे। जुलाई 2015 में गन्ना उपजाने वाले 20 से अधिक किसानो ने आत्महत्या की। हरा भरा मंड्या राजधानी बेंगलुरू से तकरीबन सौ किलोमीटर की दूरी पर है। इलाके में बारहों महीने सिंचाई के साधन भी उपलब्ध हैं। बावजुद इसके इलाके के किसान कर्ज के भारी बोझ तले दबे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल (2014-15) में किसानों ने बैंकों से तकरीबन 1200 करोड़ रूपए का कर्ज लिया। सरकारी उदासीनता, फसलों की गिरती कीमतों, स्टॉक की अधिकता और कृषि की समुचित तकनीक के मार्गदर्शन का अभाव इस भयंकर हालात के लिए जिम्मेदार कुछ कारणों में से एक हैं।

Madhuchandan C, Founder of Organic Mandya (Photo Credits : Your Story)

Madhuchandan C, Founder of Organic Mandya (Photo Credits : Your Story)

कैलिफोर्निया में सपनों की दुनिया में जी रहे मंड्या के आईटी प्रोफेशनल 37 वर्षीय मधुचंदन छिक्कादेवैय्या, इलाके के मौजुदा हालात से परेशान थे। किसानों के परिवार से ताल्लुक रखने वाले मधु का जन्म मांड्या में हुआ था औऱ उनका पूरा बचपन बेंगलुरु स्थित कृषि विश्वविद्यालय के 300 एकड़ में फैले परिसर में बीता था जहां से उनके पिता उप कुलपति के पद से सेवानिवृत हुए थे। हालांकि मधु साफ्टवेयर इंजीनियर बनने निकले, वेरिफाया कॉरपोरेशन स्थापित किया जो ऑटोमेटेड साफ्टवेयर टेस्टिंग साल्युशन बनाती थी लेकिन दिल से वो हमेशा एक किसान ही रहे।
अगस्त 2014 में एक पखवाड़े से भी कम समय में वो अपना फलता – फूलता कैरियर को पीछे छोड़, मांड्या किसानों को आगे बढ़ाने में मदद करने के लिए वापिस लौट आए। वो कहते हैं पूरी दुनिया में किसान ही एकमात्र व्यक्ति है जो थोक भाव में बेचता है लेकिन खुदरे मूल्य पर खरीदता है। इसको विस्तार से समझाते हुए वो आगे कहते हैं …किसान खेती छोड़कर मजदूरी करने के लिए शहर जा रहे हैं। स्थायित्व का अभाव उन्हें एक के बाद एक नौकरी बदलने के लिए मजबूर करता है जिससे उन्हें अनेकों आर्थिक लाभ से वंचित रहना पड़ता है। अपने परिवार और खुद का ख्याल रख पाने में असमर्थता की वजह कर्ज के दुष्चक्र में फंसना और अंतत आत्महत्या जैसा कदम उठाना इनकी नियति बन चुकी है। ये एक ऐसा दुष्चक्र है जिसे रोका जा सकता है। ऑर्गेनिक मांड्या यही करता है … किसानों को समृद्ध और स्वस्थ्य जीवन प्रदान करना ताकि इस पेशे को छोड़ कर वो कहीं न जाए।

ऑर्गेनिक मांड्या का शुभारंभ

जब मधु मांड्या पहुंचे तो वहां के बिखरे हुए परिदृश्य पर उनकी नज़र पड़ी। वहां कई किसान ऐसे थे जो जैविक कृषि का रूख कर चुके थे और देशी तकनीक की मदद से अच्छी आय हासिल कर रहे थे। हालांकि संगठित बाजार और सूचनाओं के आदान प्रदान के अभाव के रूप में अब भी कुछ महत्वपूर्ण अंतराल मौजुद था।

Organic Mandya shop on the Bengaluru – Mysuru highway (Photo Credits : Your Story)

Organic Mandya shop on the Bengaluru – Mysuru highway (Photo Credits : Your Story)

मधु का पहला कदम अपने जैसे उत्साही लोगों (मित्रों परिचितों) को एक साथ लाना था। सबने मिलकर एक करोड़ रूपया इकठ्ठा किया और मंड्या ऑर्गेनिक फारमर्स कोऑपरेटिव सोसायटी का पंजीकरण कराया। अपने पहले चरण में इस सोसायटी के साथ जैविक खेती करने वाले तकरीबन 240 किसानों को जोड़ने में सफलता मिली। ऑर्गेनिक मांड्या – जिस ब्रांड के नीचे किसान अपने उत्पाद बेच सकेंगे की स्थापना करने और सभी सरकारी औपचारिकताएं पूरी करने में उन्हें आठ महीने का वक्त लगा।

वो बताते हैं, हमने कई तरह के विचारों पर काम करना शुरू किया – बेंगलुरू में एक आर्गेनिक शॉप खोलने या ई-कामर्स वेबसाइट चलाने, रेस्त्रांओं के साथ टाइ अप करके अपने उत्पाद बेचने जैसे विचार लेकिन इसमें से कोई भी विचार ऐसा नहीं था जो जिसमें किसान ग्राहकों से सीधे संवाद कर सकते और मेरे लिए यही महत्वपूर्ण था।

मधु मानते हैं कि जब तक उपभोक्ता किसान की मेहनत और किसान ग्राहक की प्राथमिकता नहीं समझेगा तब तक खेती प्रचलित नहीं हो सकती।

मधु ने बेंगलुरू को मैसुरू से जोड़ने वाली मांड्या राजमार्ग का फायदा उठाने का फैसला किया और इस बात को लेकर वह एक तरह से निश्चिंत था कि यात्री उसके उत्पाद को खरीदने के लिए वहां जरूर रूकेंगें। लोगों में और उत्साह भरने के लिए उसने इस शॉप के बगल में एक ऑर्गेनिक रेस्त्रां की भी शुरूआत कर दी। मधु कहते हैं .. मेरी रणनीति थी कि यात्री खाने के लिए रूकेंगे और अपने साप्ताहिक किराने की जरूरत पूरी करने के लिए शॉप का रूख करेंगे। लेकिन एक आध महीने के बाद ये स्थिति बदल गई। लोग पहले हमारे शॉप पर रूकने लगे और तब खाने के लिए रेस्त्रां में जाते थे।
ऑर्गेनिक मांड्या की खुबसुरती थी मधु का वो विचार जिसमें वो किसान और ग्राहक को जोड़ते हैं। उनके मुताबिक, एक तरफ तो ग्राहक कीमत को देखते हुए ऑर्गेनिक की ओर रूख करने में झिझक रहे तो दूसरी तरफ चौबीस साल के एक किसान की मौत कैंसर से हो जाती है जो अत्यधिक रासायनिक के संपर्क में आने की वजह से उसे हुआ था। इसलिए लोगों को ऑर्गोनिक होने के फायदे पर शिक्षित करना जरूरी हो गया है और एक साझा मंच बनाए बगैर ये संभव नहीं है।
मधु ने अपने पहल को आगे बढ़ाने और लोकप्रिय करने के लिए अभिनव तरीके भी आजमाए। हम आपको बताते हैं उनके तरीकों के बारे में …
1. स्वेट डोनेशन कैंपेंन (श्रमदान) – अपनी तरह का ये अनोखी स्वयं सेवा पहल है जिसमें रूपये पैसे की बजाए पसीने का दान मांगा जाता है। मधु कहते हैं,” किसान की उपज का बीस फ़ीसदी से भी ज्यादा समय पर श्रम नहीं मिल पाने की वजह से बर्बाद हो जाता है।” इस पहल में, ऐसे लोग जो खेती में आनंद लेते हैं या जो इसको सीखना चाहते हैं वो सप्ताहांत में हमारे पास आते हैं और पूरा दिन ऑर्गेनिक मांड्या के फॉर्म पर अपना पसीना बहाते हैं। एक उदाहरण देते हुए मधु कहते हैं साठ साल की आय़ु का एक किसान एक दिन में तीन हज़ार रूपये मजदूरों पर खर्च नहीं कर सकता है। लेकिन उसके खेत में जुताई की जरूरत होने पर हमने फेसबुक पर एक गुहार लगाई जिससे 24 स्वयंसेवक हम तक पहुंचे और महज आधे दिन में ये काम पूरा कर दिया । पिछले कुछ महीनों में स्वेट डोनेशन कैंपेन ने बेंगलुरू में कालेज के छात्रों से लेकर आईटी प्रोफेशनल्स और सेवानिवृत लोगों तक करीब 1000 स्वयंसेवकों को आकर्षित किया है।

Volunteers at a Sweat Donation Campaign (Photo Credits - Your Story)

Volunteers at a Sweat Donation Campaign (Photo Credits – Your Story)

2. फार्म शेयर – ये एक और अभिनव पहल है। फार्म शेयर लोगों को आधे से दो एकड़ तक के खेत तकरीबन 35,000 रूपये की कीमत पर तीन महीने के लिए भाड़े पर लेने और अपने जरूरत के मुताबिक उस पर खाद्य पदार्थ उपजाने के लिए प्रेरित करता है। इस पैकेज के तहत परिवार को तीन महीने की अवधि में आठ से नौ रातें फार्म पर बिताने की और खेती करने की अनुमति देता है। उनकी अनुपस्थिति में जैविक मांड्या किसान उनके पूरे जमीन की देखभाल करता है। एक बार फसल तैयार हो जाने के बाद परिवार के पास उसे अपने इस्तेमाल के लिए ले जाने या जैविक मांड्या को बेचने का विकल्प उपलब्ध होता है। इससे किसान को लगातार आय के साथ साथ शहरी बाशिंदों को जैविक खेती के आनंद से जोड़ा जाता है।
3. टीम @ फार्म –  इस पहल के जरिए कंपनियों को अपने कर्मचारियों को दिन भर के लिए यहां लाने का मौका दिया जाता है ताकि वो कृषि गतिविधियों, गिल्ली डंडा, लागोरी और कबड्डी जैसे ग्रामीण खेलों, फार्म टूर जैसे व्यवस्था के जरिए पूरी प्रक्रिया को समझ सकें। इसके लिए बहुत कम शुल्क 1300 रूपये प्रति दिन उनसे लिया जाता है।

Volunteers helping a farmer with his produce (Photo Credits- Your Story)

Volunteers helping a farmer with his produce (Photo Credits- Your Story)

ऑर्गेनिक मांड्या को पूरी तरह से शुरू हुए अभी छह महीने ही हुए हैं और ये सफलता की ओर बढ़ चुकी है। कॉपरेटिव के पास पांच सौ से ज्यादा पंजीकृत किसान हैं जो सामुहिक तौर पर करीब 200 एकड़ भूमि के मालिक हैं और चावल, दाल, वनस्पति तेल, स्वास्थ्य से जुड़े उत्पाद, पेय पदार्थ, मसाला जैसे करीब सत्तर प्रकार के उत्पाद बेच रही है। जहां तक राजस्व की बात है तो कंपनी महज चार महीनों में एक करोड़ रूपए तक पहुंच चुकी है। 999 रू, 1499 रू और 1999 रूपए के मासिक बास्केट को भी बहुत लोग लेने वाले हैं। मधु कहते हैं , ” आखिरकार ऐसा स्वस्थ्य उत्पाद किसको अच्छा नहीं लगता है जो एक महीने तक चलता है, जिसको ऑनलाइन मंगाया जा सकता है। पर सबसे महत्वपूर्ण है कि अब लोग मांड्या वापस लौट रहे हैं। मधु कहते हैं “मेरी सबसे बड़ी सफलता तब होती है जब कोई शहर से खेती करने के लिए वापस लौटता है। और अब तक 57 लोग अपने जमीन पर लौट चुके हैं। ये ग्रामीण, जैविक क्रांति की महज़ शुरूआत है।”

टिकाऊ भविष्य का रास्ता

Photo Credits : Your Story

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मधु इस बात को भली भांति जानते हैं कि किसी भी व्यापार को फलने फुलने के लिए उसका टिकाऊ होना एक जरूरी शर्त है। लेकिन वो इसके टिकाऊ होने के फायदे को किसान और उपभोक्ता दोनों तक पहुंचाना चाहते हैं। मधु दो हजार से तीन हजार रूपये तक की प्रति माह खरीद करने वाले करीब दस हजार परिवार को जोड़ने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं ताकि तीस करोड़ रूपये तक राजस्व हासिल किया जा सके। वो कहते हैं “विचार ये है कि एक हजार रूपये की सदस्यता शुल्क के साथ पहले परिवार को हम अपना सदस्य बनाएंगे। इसके दोहरे लाभ होंगे – सदस्यों को हमारे उत्पाद पर ठीक ठाक छूट मिलेंगे और साथ ही हम उन्हें खाने पीने की स्वस्थ्य परंपरा से जोड़ेगें।

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