बीदर : कर्नाटक के बीदर जिले में स्थित होन्नीकेरी गांव जब सूखे की चपेट में था उस वक्त गांव के ही एक युवा किसान ने अपनी समझदारी भरे पानी के बेहतर प्रबंधन के जरिए सब्जियां और मसाले उपजाने में सफलता पाई। पानी के इस दूरदर्शी प्रबंधन के जरिए ही रविंद्र शिवराज पाटिल की प्रतिवर्ष सालाना आय 8 से 10 लाख रूपए तक पहुंच गई है।

पाटिल ने पूरे खेत को एक ढाल के रूप में तैयार किया, खेत में आने वाली वाली वर्षा की धारा को खेत से गुजरने वाली एक प्रवाह के रूप में एक जगह पर इकठ्ठा किया। प्रवाह के अंत में दोनों ही सिरों पर दो चैक डैम बनाए। खुले कुएं में पानी जा सके इसके लिए बंद और नहर बनाए ताकि बोरवेल को पानी से भरा जा सके। ड्रिप सिंचाई की नालियों के जरिए अपने बीस एकड़ के फार्म के हर हिस्से तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था की। इसके बाद बड़ी सूक्ष्मता से उपजाने के लिए ऐसी फसलों का चयन किया जिसकी कीमत स्थिर हो और जिनकी सिंचाई के लिए कम से कम पानी दरकार हो। अपनी इस योजना के बारे में बताते हुए 35 वर्षीय पाटिल कहते हैं “मैं उस स्तर तक पहुंच गया हूं जहां मेरे फसल को अब किसी प्रबंधन की जरूरत ही नहीं है।

इस सफलता के पीछे श्रमसाध्य मेहनत की एक लंबी कहानी है। साल 1999 में विरासत में पाटिल को ऐसे खेत मिले थे जो किसी लहरदार रेगिस्तान की तरह लगते थे। उस वक्त अल्पआयु के पाटिल को ये समझ में नहीं आता था कि इसका क्या करना है। उन्होंने गन्ने की फसल लगाई। जाहिर है फसल का उत्पादन आशानुकुल नहीं रहा। उत्पादन देखकर उन्हें ये समझ में आया कि ये फसल इसके अनुकूल नहीं है।

उस दौर के बारे में बताते हुए पाटिल कहते हैं कि तब मेरे एक मित्र ने लहसून उपजाने की सलाह दी। मात्र एक एकड़ में लगाई लहसून की फसल से अच्छा लाभ हुआ फिर उन्होंने इसका विस्तार करने का विचार किया।  पाटिल कहते हैं “इसके लिए मुझे अपने खेत को एक जैसा समतल करना था। लेकिन इसके लिए बहुत अधिक मेहनत करने की जरूरत थी क्योंकि टीलों को समतल करना था और ढाल बनाना था।

मैंने जिले की सहकारिता बैंक से ट्रेक्टर खरीदने के लिए ऋण लिया और खेत को समतल करने के अभियान में जुट गया। शुरू के कुछ महीनों मैंने खुद से काम किया ताकि चट्टानों को हटाया जा सके। दूर से कीचड़ ला कर खेत में उसको फैलाया। पहले चार एकड़ में मैंने पास ही बह रहे एक प्रवाह से गाद उठाकर बिछा दिया। बचे सात एकड़ को पाटिल ने लहसून उपजाने के लिए बेहतर ढंग से तैयार किया।

पाटिल बताते हैं “हमने पहले छह फीट गहरे , साठ मीटर लंबे और पांच सौ मीटर चौड़ा एक शंक्वाकार गड्डा खोदा। उसके प्रवाह में बोल्डर, पत्थर औऱ चिकनी मिट्टी बिछा दिए ताकि पानी की धारा आसानी से बह सके। इससे पानी का प्रवाह तैयार करने में आसानी हुई। पानी के इस चक्र को स्थापित करने से उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई और इसके जरिए मिट्टी को महीनों तक आद्र रखा जा सका।

अब पाटिल गर्मी आने के पहले दो एकड़ में फैले तालाब का निर्माण कार्य पुरा करने में लगे हैं। अभी उपरी प्रवाह को बांधने का काम शूरू हुआ है। पाटिल कहते हैं कि मैं ये सुनिश्चित करूंगा कि पानी की एक भी बूंद मेरे खेत से बाहर न जा सके।

वो वाटर टैंक से बायो डायजेस्टर को जोड़ने की योजना बना रहे हैं ताकि पानी ड्रिप सिंचाई ट्यूब से बह सके। उनकी कोशिश है कि गर्मियों के पहले ये काम करना शुरू कर दे। पाटिल कहते हैं वो सूखे को लेकर चिंतित तो हैं लेकिन घबरा नहीं रहे हैं। पाटिल का कहना है कि ऐसी किसी भी स्थिति से लड़ने के लिए वो तैयार हैं।

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