दार्जलिंग में चाय की खेती के दौरान 78 वर्षीय राधे श्याम तिवारी को सागौन के पेड़ देख कर खुशी होती थी। सेवानिवृति के बाद जब राधेश्याम राजस्थान की राजधानी जयपुर से 20 किलोमीटर दूर दौलतपुरा पहुंचे रहने के लिए तो अपने इस छह एकड़ के फॉर्म की चाहरदीवारी के साथ साथ वो सागौन के पौधे लगाना चाहते थे जहां उनके बच्चे पहले से ही नींबू, गेंहू और करौंदे की खेती कर रहे थे।  लिहाज़ा अपने इच्छा को पूरी करने के लिए जब वो सागौन के पौधे लेने के लिए जयपुर वन विभाग के कार्यालय पहुंचे तो उनकी इस मांग को पागल कह कर खारिज कर दिया गया। वन विभाग से उन्हें कहा गया कि राजस्थान की इस गर्मी में सागौन के पेड लगाए ही नहीं जा सकते। वन विभाग के इस जबाव से असंतुष्ट तिवारी ने खुद ही इसको लेकर कुछ करने की ठानी। तकरीबन बीस साल के सागौन के अपने पेड़ों के बीच घुमते हुए तिवारी बताते हैं  1995 मैं प्रति पौधे दस रूपए की कीमत से दार्जिलिंग से सागौन के 250 पौधे लेकर आया और अपने फॉर्म में उन्हें लगाया। आज उन 250 पौधों में से 185 बड़े पेड़ की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं। उस वक्त मैंने ये सोचा था अगर पड़ोस के मध्य प्रदेश में सागौन लगाया जा सकता है तो जयपुर के पास क्यों नहीं। इसलिए मैंने इन पौधों को यहां पर लगाने की इस चुनौती को स्वीकार किया और उसका नतीजा आज आप सब देख सकते हैं” तो क्या ये इतना आसान था ? तिवारी बताते हैं जयपुर में सागौन लगाना चुनौतिपूर्ण तो था ही क्योंकि इसको लेकर एक तो यहां कि पर्यावरणीय परिस्थितियां अलग थी साथ ही इसको लेकर कोई सहायता तंत्र का भी यहां अभाव था।इसके साथ ही एक सागौन के पेड़ को पूरी तरह से बड़े होने में कम से कम बीस साल का वक्त लगता है। राधेश्याम तिवारी जी अपनी बात को मुस्कुराते हुए जारी रखते हैं, कहते हैं, सौ साल पुराने सागौन के पेड़ों की अच्छी कीमत मिलती है। वर्तमान में सागौन की कीमत बाजार में 3500 रूपये प्रति क्यूबीक फीट है, मैं इन्हें बेचने के बारे में नहीं सोच रहा हूं पर हां एक बात तो है कि मैं इन 185 पेंड़ों का मालिक हूं और तकरीबन एक करोड़ 85 लाख रूपये की ये संपत्ति मेरी है।

अपने फॉर्म के आसपास तिवारी जी ने तकरीबन पांच सौ से भी ज्यादा सागौन के पौधे स्थानीय किसानों को दिए हैं। वो कहते हैं कि अब दौलतपुरा में सागौन के पेड बहुत कॉमन हो गए हैं।

(अंग्रेजी दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स से साभार)

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