पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के प्रतिष्ठित उज़ागर सिंह धालीवाल अवार्ड और मुख्यमंत्री सम्मान से सम्मानित पटियाला के साहौली गांव के किसान मेहरबान सिंह सब्जियों की संरक्षित खेती में लगे हुए हैं। सब्जियों की संरक्षित खेती की विधि से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों मसलन बुआई के तरीकों, कीटनाशकों के छिड़काव आदि को लेकर मेहरबान सिंह निरंतर कुछ न कुछ नया करने की कोशिश में लगे रहते हैं। हाल ही में अपने लंदन की यात्रा के दौरान उन्होंने सब्जियों के बाज़ार जाकर सब्जियों के निर्यात से संबंधित बारीकियों को समझने की कोशिश की। उपज और उससे होने वाली आय दोनों ही मामलों में प्रति इकाई जल उत्पादकता में बढ़ोत्तरी करके अनाज की एकल कृषि (मोनोकल्चर) छोड़कर उन्होंने सब्जियों की खेती करने का फैसला किया। सब्जियों को उपजाने के लिए बड़ी संख्या में विकल्पों की उपलब्धता को देखते हुए वो आवश्यकतानुसार खेत और फसल का चयन बारी बारी से करते हैं ताकि मिट्टी की पोषण क्षमता और स्वास्थ पर दबाव कम रहे। अपने सभी खेतों में सिंचाई के लिए उन्होंने उपयोग ड्रीप और स्प्रींकलर प्रणाली लगा रखी है। ड्रीप प्रणाली की मदद से ही वो खेतों में उर्वरकों का भी छिड़काव करते हैं। ड्रीप प्रणाली के साथ ही वो फसलों के लिए पलवार पद्दति (फसल की जड़ को जैविक खाद से बांधने) का प्रयोग करते हैं जिससे न केवल पानी की बचत होती है बल्कि खेतों में खरपतवारों के नियंत्रण में भी मदद मिलती है। अपने खेतों में उन्होंने एक कुएं का भी निर्माण करा लिया है ताकि भूमिगत जल के स्तर को बरकरार रखा जा सके और नहरों से बहकर आने वाले पानी को बर्बादी से बचाया जा सके। सब्जियों पर आधारित विविध खेती को अपनाकर उन्होंने अपने आय में परंपरागत खेती की तुलना में तीन गुनी बढ़ोत्तरी कर ली है। मेहरबान सिंह की संरक्षित खेती को बढ़ावा देने के लिए देश में उर्वरकों की सबसे बड़ी सहकारी संस्था इफको ने भी उन्हें 20,000 रूपये की मदद की। आप इन्हें पंजाब की नई फसल कह सकते हैं, पंजाब के ये किसान अपनी उपज का दुनिया भर में विपणन भी कर रहे हैं।

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उंचे दामों में बिकने वाली सब्जियां जैसे टमाटर, करेला और लौकी को कॉरपोरेट तरीके से उपजाने और बेचने के बाद पंजाब में किसान पीले और लाल मिर्च औऱ बीज रहित खीरा जैसे विदेशी फसल की ओर भी रूख कर रहे हैं।

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यही नहीं, पंजाब के सब्जी उत्पादक इलाके लुधियाना, पटियाला, जालंधर और फतेहगढ़ साहिब ज़िलों के तकरीबन 50 प्रगतिशील किसानों ने गुणवत्तापूर्ण शाकाहारी उत्पाद के लिए एक मंच बनाया जिसके जरिए ये किसान अपने सब्जियों का विपणन, जिनके उपज के दौरान तयशुदा प्रमाणिक मानकों के अनुरूप उर्वरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग किया गया है, खेती में प्रोद्यौगिकी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने, खुदरा विक्रेताओं से मोल भाव करने, संभावित देशी विदेशी बाजार की तलाश करने के लिए करते हैं।

परंपरागत खेती करने वाले लुधियाना के समराला ज़िले के मुश्काबाद के चालीस वर्षीय देविंदर सिंह और पटियाला जिले के नाभा के रहने वाले चौंतीस वर्षीय मेहरबान सिंह को विदेशी और ऊंची कीमत वाली सब्जियों का मोल समझने में छह से सात साल लग गए। ब्रिटेन में रहने वाले एमबीए डिग्री धारी चौंतीस वर्षीय सिकंदर तवाना ने जब 2008 में उनके फार्म्स का दौरा किया तो उन्होंने भी इनकी सफलता को अपने खेतों में दोहराने का संकल्प लिया। यहीं से इन्होंने एक सामूहिक मंच बनाने का फैसला किया। तीनों ने इसके लिए राज्य के और भी सब्जी उत्पादकों और एंव एनआरआई कृषकों के साथ मिलकर गुणवत्तापूर्ण शाकाहारी उत्पादकों के लिए एक कंपनी की शुरूआत की। दो सालों में कंपनी में सदस्यों की संख्या 50 तक पहुंच गई जिसमें अमेरिका में रहने वाले उदय पाल सिंह जैसे कृषक भी शामिल हैं जो पंजाब के पटियाला स्थित सनयार खेड़ी गांव के स्थित अपने खेतों में सब्जियां उगाते हैं।

टमाटर, हरी मिर्च, बीज रहित खीरा, करेला और लौकी जैसी सब्जियां उपजा कर देविंदर और मेहरबान प्रति एकड़ सत्तर से अस्सी हज़ार रुपये तक की आमदनी करते हैं जबकि दिसंबर से फरवरी के बीच ठंड और पाले से बचाने के लिए पॉली हाउसेज और लो टनल प्रौद्योगिकी के जरिए शिमला मिर्च उपजा कर इनको चार से पांच लाख प्रति एकड़ की आमदनी हो जाती है। देविंदर और मेहरबान बताते हैंहम व्यवहार में विविधता की अवधारणा को बेच रहे हैं। पंजाब में भूमिगत जल संसाधन बहुत महत्वपूर्ण हैं और अंधाधुंध एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाशियन) उर्वरकों एवं कीटनाशकों का इस्तेमाल हो रहा है। हम ड्रीप सिंचाई का इस्तेमाल करके पानी का कम से कम इस्तेमाल करते हैं और साथ ही हमारे उत्पाद के वालमार्ट, टाटा के खेत के स्टोर और फाइव स्टार होटले में पहुंचने से पहले जालंधर की एक एजेंसी हमारे उत्पादों का निरीक्षण करके इस बात का प्रमाण हमें प्रदान करती है कि इन उत्पादों में  कीटनाशकों और ऊर्वरकों का सीमित मात्रा में उपयोग हुआ है

अपने उत्पादन के जरिए उंची आमदनी ने इन किसानों को खेतों में हाड़ तोड़ मेहनत करने वाले पहचान से इतर थ्री सूट पहनकर अपने उत्पाद सब्जियों को स्टोर्स और फाइव स्टार होटलों में पहुंचाने वाले के रूप में ही केवल पहचान नहीं दी है बल्कि इन्हें वैश्वविक पहचान भी दिलाई है। देविंदर ने पिछले साल रूस का दौरा किया था जिसके बारे में देविंदर बताते हैं कि वो मिर्च का एक बड़ा बाज़ार है। मेहरबान ने ब्रिटेन का दौरा कर लौकी के निर्यात की संभावनाएं टटोली। रूस में मिर्च 200 रुपए प्रति किलो बिकता है जबकि ब्रिटने में लौकी की खुदरा मूल्य दो पाउंड प्रति किलो है। अपने भविष्य की योजनाओं के बारे में बात करते हुए दोनों बताते हैं कि इस साल के अंत तक उनकी योजना अपने फार्म में ग्रेडिंग, पैकिंग और कूलिंग की सुविधा जुटाने की है ताकि सब्जियों की ताजगी को लंबे समय तक बचाए रखा जा सके। देविंदर कहते हैं कि इससे न केवले अपने उत्पाद के एक बड़े हिस्से को वो बर्बाद होने से बचा सकेंगे बल्कि दुनिया के बाज़ारों से भी जुड़ पाएंगे।

 

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