असम के नौगांव ज़िले के लखनाबांधा गांव की साल 2012 के शुरूआत की ये तस्वीर भारत के किसी भी आम गांव की तरह ही है। गांव के किनारे अनुपयोगी ज़मीन पर झाड़ झंखाड़ के बेतरतीब जंगल। गांव में शायद ही कभी किसी ने ये कल्पना भी की थी अनुपयोगी ज़मीन का ये टुकड़ा उनके लिए प्रकृति का वरदान भी साबित हो सकती है। साल 2012 से सिर्फ एक पहल ने गांव वालों के लिए जीवन के मायने ही बदल दिए।

Area till mid 2012 (1) Water Melon Cultivation (2)

झाड़ झंखाड़ से भरे अनुपयोगी पड़े इस ज़मीन के तकरीबन ढाई बीघे हिस्से पर जुलाई 2012 में प्रयोग के तौर पर तरबूज की खेती हुई। साल 2013 तक आते आते उस बियाबां के करीब 14 बीघे के दायरे में फैल गई तरबूज की ये खेती। ये प्रयोग यही नहीं ठहरा … साल 2014 तक उस विराने के 42 बीघे में तरबूज की खेती हो रही थी। उत्पादन औऱ गुणवत्ता के लिहाज से भी यहां उपजा तरबूज उत्तम कोटि का था। बस फिर क्या था … गांव वालों को तो बिन मांगे मुराद मिल गई।

Water Melon Cultivation (3) Growth of Water Melon Area in 2013

सार्थक पहल से शुरू हुए तरबूज की खेती का सफर बस वहीं नहीं रूका। गांव वालों ने Poly Mulching तकनीक (फसल की जड़ में खर पतवार या हरी खाद को पॉलिथीन के जरिए बांध दिया जाता है) के जरिए शिमला मिर्च की खेती में भी हाथ आजमाए और सफलता पाई। फूल और खीरा भी उपजाए गए।

Growth of Water Melon Area in 2013 (5) Growth of Water Melon Area in 2014 (6)

इस अनुपयोगी पड़े झाड़ – झंखाड़ के जंगल में प्रयोग के तौर पर शुरू की गई खेती पारंपरिक तकनीक से अलहदा थी। नए प्रयोग के तहत खेती के नए और अधिक परिणामकारी तकनीक का प्रयोग किया मसलन Poly Mulching तकनीक के जरिए उत्पादन को जैविक तरीके से बढ़ाया जा सकता है। यही नहीं बहु फसलीय पद्दति को भी यहां सफलतापूर्वक आजमाया गया।

Productivity & Quality (7)

साल 2014-15 तरबूज, शिमला मिर्च, फूल और खीरा के उत्पादन की सफलता से उत्साहित गांव के किसानों ने बहु फसली पद्धति के तहत आलू के साथ परवल की खेती की। परवल की फसल में बेहतर उपज के लिए परवल के खेत में पहले पहले पुआल बिछा कर फिर उस पर परवल की फसल तैयार की गई।

Capsicum Tested under Poly-mulching (9) Capsicum tested under poly-mulching (10)

लौकी और गन्ने के फसल भी Poly Mulching तकनीक के जरिए सफलता पूर्वक उपजाए। सब्जियों की विभिन्न किस्में मसलन तुरई, मूली और जरबेरा के फूल आदि बहुतायत में उपजाए गए।

14Other Crops tested successfully (11)

 

लखनाबांधा गांव में बेकार पड़े झाड़ियों से भरे जंगल के इस टुकड़े पर सहकारी संस्था इफको के पहल और गांव वालों के सामुहिक प्रयास ने सफलता की एक नई इबारत लिख दी। सफलता के इस कहानी में कई नए प्रयोग थे।

 

1918

इलाके के पारंपरिक फसल पद्दति से इतर इलाके के लिए अनजान माने जाने वाले तरबूज और शिमला मीर्च की खेती सफलता पूर्वक की गई। इससे गांव के किसानों को खासा लाभ हुआ। लखनाबांधा के इस प्रयोग से उत्साहित आस पास के गांवों में भी किसानों ने भी तरबूज और शिमला मिर्च की खेती शुरू कर दी है।

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इफको की पहल पर ढाई बीघे की अनुपयोगी जमीन पर शुरू की गई खेती के इस प्रयोग से उत्साहित लखनाबांधा के किसान इस साल इलाके के पचास बीघे अनुपयोगी जमीन पर खेती कर रहे हैं। ज़ाहिर है इफको के इस सार्थक पहल ने लखनाबांधा के लिए अच्छे दिनों की शुरूआत कर दी।

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