महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के एक छोटे से गांव नांदेड़ के सीमांत किसान दादा जी रामजी खोबरागडे अगर चाहते तो अपनी चतुराई और चावल की नई किस्म को विकसित करने के बाद इलाके में धान की खेती में क्रांति ला देने की बदौलत बीज की बड़ी कंपनियों मौंसेंटो और सेनजेंटास की तरह ही दुनिया पर राज कर रहे होते। लेकिन दादा जी ने ऐसा करने की बजाए अपने ज्ञान के खजाने को अपने इलाके के लोगों की भलाई के लिए उन्हें मुफ्त में बांटना बेहतर समझा। यही वजह है कि विदेशी पत्रिका फोर्ब्स की सात शक्तिशाली ग्रामीण भारतीयों की सूची में शामिल होने के बाद भी साठ वर्षीय खोबरागड़े जमीन के एक छोटे टुकड़े पर खेती करने वाले, एक तंग और गंदे से झोपड़े में रहने वाले एक छोटे और गरीब किसान ही बने रहते हैं।

अपने उसी खेत में काम करते करते साल 2010 में उन्होंने धान की एक और नई किस्म विकसित की। दादाजी खोबरेगड़े खुद बताते हैं कि उनके द्वारा विकसित की गई ये धान की नौंवी किस्म है। इस नई किस्म का नामकरण अपने नाम पर डीआरके –टू करते हुए विश्वास भरे शब्दों में वो कहते हैं, ये धूम मचा देगा। फोर्ब्स पत्रिका की सूची में उनका नाम शामिल होने पर आश्चर्यमिश्रित स्वर में दादा जी खुशी व्यक्त करते हुए बताते हैं कि उन्हें नहीं पता कि इसका क्या मतलब होता है लेकिन उन्हें ये अच्छा लगा कि उनके काम को कहीं मान्यता मिली। 

नेशनल इनोवेशन फाउंडेश के प्रतिष्ठित सम्मान से दो बार नवाजे जा चुके दादाजी को धान की लोकप्रिय किस्म एचएमटी-सोना की खोज का श्रेय है। एच एम टी – सोना धान की ऐसी किस्म जो भारत के एक बड़े इलाके में बोई जाती है। इस वजह से दादा जी अपने इलाके के किसानों के लिए प्रेरणा हैं।

इस प्रेरणास्पद कहानी की विडंबना ये है कि धान की एचएमटी सोना किस्म को विकसित करने के बाद भी इसके बौद्धिक संपदा अधिकार के लिए अकोला स्थित राज्य सरकार की पंजाबराव देशमुख कृषि विश्वविद्यालय से उन्हें एक असफल लड़ाई लड़नी पड़ी। अकोला विश्वविद्यालय एचएमटी बीज विकसित करने का दावा करते हुए कहता है कि मातृ बीज को शुद्ध और संकरित कर विश्वविद्यालय ने धान की ये नई किस्म विकसित की है। हालांकि विश्वविद्यालय में ही लोग इस दावे को गलत भी बताते हैं।  

दादाजी बताते हैं कि 1980 में श्रमसाध्य प्रयासों और खेत में सावधानीपूर्वक अभ्यास के जरिए उन्होंने धान की ये किस्म विकसित की। वो बताते हैं कि धान की तीन अलग अलग किस्मों से धान की इस प्रजाति को संकरित कर विकास करने में उन्हें एक दशक से भी अधिक का वक्त लगा। अपनी खुशबू और ज्यादा उत्पादन की वजह से धान की ये संकर किस्म न केवल इस इलाके में बल्कि पड़ोसी राज्यों तक में तुरंत लोकप्रिय हो गई। हालांकि उनका इस प्रयास कृषि अनुसंधान संस्थानों ने बहुत हद तक नोटिस भी नहीं किया। बहुत कम साधनों के बीच अपने सात सदस्यीय परिवार के भरन पोषण के लिए दैनिक मजदूरी तक करने वाले दादजी ने अपने बेटे के इलाज के लिए अपने दो एकड़ खेत भी बेच दिए।

साल 1994 में पास ही के सिंधेवाही राइस स्टेशन जो कि पंजाबराव देशमुख कृषि विधापीठ का ही हिस्सा खोबरागडे से पांच किलो एचएमटी बीज ये कह कर लिया कि राइस स्टेशन इन बीजों के साथ प्रयोग करना चाहता है। अनुसंधानकर्ताओं ने ये इन बीजों को शुद्ध कर 1998 में पीकेवी एचएमटी के नाम से पूरे राज्य में नई संकरित धान की किस्म को जारी कर दिया । खोबरागडे कहते हैं, अब ये बीज 1200 रुपये प्रति क्वींटल बेचे जा रहे हैं। इन सबसे मुझे क्या मिला? सरकार मुझे कोई श्रेय नहीं देना चाहती है और किस्म के विकास का वो दावा कर रहे हैं वो बिल्कुल मेरे जैसा ही है। मुझे उसमें कोई अंतर नजर नहीं आता है। अपने गुणों के कारण उस इलाके में प्रचलित अन्य धान की किस्मों की तुलना में एचएमटी दुगुने कीमत पर बिकती है।

सरकारी संस्थानों के इस गड़बड़झाले के बाद औऱ जीवन की तमाम मुश्किल पलों के बाद भी खोबरागडे विचलित नहीं हुए। अपने काम के लिए सरकारी मान्यता नहीं मिलने के बाद भी संकर किस्मों को विकसित करने का उनका अभियान कभी रूका नहीं। अब तक वो कम से कम नौ संकर किस्में विकसित कर चुके हैं। मिलने वालों के सामने वो बड़े गर्व इन उन्नत प्रजाति की बीजों का प्रदर्शन करते हैं। उनकी विकसित की गई इन संकर प्रजातियों की धान का प्रति एकड़ कम से 15-16 क्वींटल उपज प्राप्त होता है।

राज्य सरकार की महाबीज संघ पीकेवी के साथ सहयोग करके पिछले एक दशक से भी अधिक वक्त से एचएमटी सोना का बड़े स्तर पर व्यापार कर रही है। बावजुद इसके की अपने बेटे की बीमारी के दौरान अपने तीन एकड़ खेत को बेचने की मजबूरी के बाद इस बुजुर्ग किसान का बीजों से संकरित किस्म बनाने को लेकर अनथक प्रयास लगातार जारी है। बिना रूके बिना थके अब तक नौ संकरित बीज तैयार कर चुके हैं दादा जी। दादा जी अपने संकरित बीज को मान्यता दिलाने के लिए धान अनुसंधान केंद्र को संपर्क भी किया लेकिन केंद्र उनको मान्यता देने से यह कह कर इंकार कर दिया कि ये वैज्ञानिक अनुंसंधान प्रक्रियाओं के पालन पर आधारित नहीं है। लेकिन 1993 में नांदेड़ की ग्राम पंचायत ने अपनी बैठक में एक प्रस्ताव पारित कर दादाजी के काम पर अपनी मुहर लगा दी। साल 1994 में स्थानीय सांसद विलासराव मुतयन ने उनके इस उपलब्धि पर उन्हें एक सार्वजनिक समारोह में सम्मानित किया। इसी साल नागभीड के प्रखंड विकास अधिकारी ने एक कृषि सम्मेलन में दादाजी को सम्मानित कर उनकी कार्य को मान्यता दी। समाचार माध्यमों में इनके उपलब्धि की चर्चा होने के बाद चंद्रपुर के तत्कालीन कलेक्टर ने पंजाबराव कृषि विधापीठ को पत्र लिखा जिसके बाद डॉ मोघे और विश्वविद्यालय अनुसंधान निदेशालय ने उनकी इस उपलब्धि को मान्यता प्रदान किया। पूरे विदर्भ इलाके के किसान धान की इसी संकरित किस्म को उपजाते हैं क्योंकि इसमें उत्पादन ज्यादा मिलता है और इसके चावल एक अलग तरह की खुशबू होती है। पड़ोस के आंध्र प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई इलाकों में धान की एचएमटी किस्म बेहद लोकप्रिय हो चुकी है।

आखिरकार दो दशक से भी अधिक वक्त तक चली इसी लड़ाई के बाद ही सही दादाजी की कार्यों को मान्यता मिल गई। इससे ज्यादा खुशी की बात उनके लिए कुछ औऱ नहीं है। हालांकि अब भी इससे उनके जीवन के हालात में बदलाव कैसे आए , इसका रास्ता नहीं बना है।

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