नई दिल्ली : देश में डिजिटल अंतराल ( डिजिटल डिवाइड ) को पाटने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान का असर भारतीय मूल की अमेरिकी छात्रा सोनिया उप्पल पर साफ तौर पर देखा जा सकता है। अमेरिका के कैलिफोर्निया शहर में रहने वाली सोनिया हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण युवाओं को कंप्युटर प्रोग्रामिंग तकनीक का प्रशिक्षण दे रही है। 

2014 में शुरू किए गए अपने प्रोजेक्ट “Pi A La Code” — के जरिए हिमाचल प्रदेश की खुबसुरत वादियों में बसे कसौली के सरस्वती निकेतन सिनियर सेकेंडरी स्कूल में सोनिया गांव के युवाओं को कम्युटर प्रोग्रामिंग सिखने में मदद कर रही है।

कैलिफोर्निया से अपने इस अनुभव को एक भारतीय समाचार एजेंसी के साथ टेलिफोन पर हुई बातचीत में साझा करते हुए सोनिया उप्पल ने बताया ” ऐसे साफ्टवेयर बनाना जिसे लोग सिख सकें, मुझे हमेशा से उत्साहित करता रहा है और इसलिए मैंने भारत के ग्रामीणों तक कंप्युटर विज्ञान को ले जाने का निश्चय किया।”

कैलिफोर्निया में जन्मीं और पली बढ़ी सोनिया ने संयोग से सिलिकॉन वैली में एक प्रदर्शनी में बच्चों के लिए उपयोगी और छोटे कम्प्युटर बनाने वाली कंपनी रासप्बेरी पी की बनाई गई 35 डालर कीमत की कम्प्यूटर को देखा। कम लागत वाले इन कम्प्युटरों को देखकर तुरंत ही सोनिया के मन में इन कंप्युटरों को भारत लाने का ख्याल आया। सोनिया उस वक्त अपने पिता के भारत में ट्रांसफर की वजह से बैंग्लुरू के इंटरनेशनल स्कूल बैंग्लोर में कम्प्युटर विज्ञान की पढ़ाई कर रही थी।

बाद में उन्हें ये अहसास हुआ कि उनके स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों को तो इस बेसिक कम्प्युटर की जरूरत नहीं है। फिर उनके मन में ये ख्याल आया कि क्या ग्रामीण भारत में पढ़ रहे छात्रों को इस कम्प्युटर की जरूरत है, जिनके लिए ये साधारण प्रणाली भी शिक्षा का उपयोगी उपकरण साबित हो सकता है ?

तभी से सोनिया के मन में “Pi A La Code” का विचार आकार ग्रहण करने लगा। सोनिया कहती हैं “मुझे लगा कि ये तब और उपयोगी साबित होगा जब मैं इस उपकरण को गांवों में मौजुद स्कूलों में ले जाउंगी। जहां इसका प्रभाव ज्यादा होगा।”

इस बीच सोनिया ने दस रासप्बेरी पी शिक्षण सेट खरीदने के लिए पैसे इकठ्ठे कर लिए। स्टैंफोर्ड की शी++ फेलो के रूप में उनका चयन होने से पहले उन्होंने कम्युटर प्रोग्रामिंग के क्षेत्र में व्यापक तौर पर इस्तेमाल होने वाले लैंग्वेज पाइथन के बारे में जाना और उसका प्रशिक्षण लिया। स्टैंफोर्ड की शी++ एक सामाजिक उद्यम है जो प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बेहतर करने के लिए महिलाओं को तैयार करता है।

यहां उप्पल की मुलाकात ऐसे लोगों से हुई जिन्होंने उन्हें ग्रामीण भारत में छात्रों को कंप्युटर प्रोग्रामिंग सिखाने जैसे महत्वपूर्ण और बेहतर कार्य करने के लिए न केवल प्रेरित किया बल्कि मदद भी की।

उत्साह से लबरेज़ सोनिया ने खुद से कम्प्युटर प्रोग्रामिंग सिखाने के लिए एक पाठ्यक्रम तैयार किया और 2014 में दस दिनों के लिए अपने नानी घर कसौली चली आई। शुरूआती बाधाओं से निपटने के बाद उनका ये सफर तुलनात्मक रूप से आसान हो गया। सरस्वती निकेतन सिनियर सेकेंडरी स्कूल में कम्प्युटर विज्ञान पढ़ाने की अनिवार्य अनुमति उन्हें मिल गई। अपनी टूटी फूटी हिन्दी में दसवी और ग्यारहवीं के छात्रों को कम्प्युटर और कम्प्युटर प्रोग्रामिंग लैंग्वेज पाइथन उन्होंने पढ़ाना शुरू किया।

भारत के ग्रामीण इलाकों अपने काम के अब तक के अनुभव पर बात करते हुए सोनिया कहती हैं “मुझे लगा था कि यहां भाषा और अन्य तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ेगा लेकिन इंटरनेट की कनेक्टिविटी की समस्या के अलावा अब तक कोई और बड़ी समस्या का सामना करना नहीं पड़ा है।”

उनका विषय मजेदार, छात्रों को जोड़ने वाला और छात्रों से त्वरित प्रतिक्रिया प्रदान करने वाला है। सोनिया कहती हैं “पाई प्रणाली पर काम कैसे करना है और पाइथन यहां के छात्रों ने बहुत जल्दी सीख लिया जो मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था क्योंकि इन छात्रों का कम्प्युटर के बारे में इससे पहले की जानकारी सिर्फ मॉनिटर को स्वीच ऑन और ऑफ करने या वर्ड डाक्युमेंट को सेव करने तक ही सीमित था।”

2014 में अपने दस दिनों के दौरे के बाद सोनिया उप्पल वापिस अमेरिका लौट गईं लेकिन यहां के छात्रों को पढ़ाने का काम स्काइप के जरिए पूरे साल चलता रहा। pialacode

2015 में वो फिर कसौली लौंटी और छात्रों को वेब प्रोग्रामिंग और पाइथन पढाया। सोनिया अपने इस प्रयास से बहुत खुश हैं और अपनी इस खुशी को साझा करते हुए कहती हैं “मैं सचमुच बहुत खुश हूं कि मैं इस प्रोजेक्ट के जरिए इतने छात्रों से जुड़ सकीं। मैं हमेशा से ही समाज के वंचितों को कम्प्युटर से जोड़ना चाहती थी।” सोनिया बड़े गर्व से बताती हैं कि उनके पढ़ाए कई छात्र अब कॉलेज की पढाई शुरू करने वाले हैं और कम्प्युटर साइंस को उन्होंने अपने कैरियर का आधार बनाना तय किया है।

अपने इस अनुभव से उत्साहित सोनिया उप्पल अपने इस प्रयोग को कसौली से बाहर भी ले जाना चाहती हैं। साथ ही प्रदेश के अन्य स्कूलों में भी रासप्बेरी पाई प्रोग्राम को पाठ्यक्रम में शामिल कराने के लिए वो हिमाचल प्रदेश सरकार के प्रतिनिधियों से भी मिलने का मन बना रही हैं। सोनिया कहती हैं कि चूंकि इसकी पढ़ाई में बहुत खर्चा नहीं आता है, इसलिए इसको राज्य के अन्य स्कूलों में भी शुरू किया जा सकता है।

हालांकि, सोनिया फिलहाल इस प्रोजेक्ट के पाठ्यक्रम के दौरान पढाई गई सामग्रियों को एक ई बुक के शक्ल में लाने की तैयारी में लगी हैं।

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