हाल ही में विदेशी पत्रिका फोर्ब्स ने अंशु गुप्ता को भारत के सशक्त ग्रामीण की सूची में में शामिल किया है। इससे पहले गैर सरकारी संस्था ‘गूंज’ के संस्थापक अंशु गुप्ता को वर्ष 2015 का रमन मैगसेसे सम्मान दिया गया। रमन मैगसेसे सम्मान देने वाली संस्था ने अपने बयान में अंशु गुप्ता के बारे में कहा “ भारत में दान की संस्कृति को अनुकूल बनाने की उनकी रचनात्मक दृष्टि, कपड़ों को गरीबों के सतत विकास के लिए एक टिकाऊ संसाधन बनाने की उनकी उद्यमशीलता, और दुनिया को ये अहसास कराने के लिए कि सच्चा दान हमेशा मानवीय प्रतिष्ठा का सम्मान और हिफाज़त करती है”। रमन मैगसेसे अवार्ड फाउंडेशन के ये शब्द बहुत कम शब्दों में गूंज के कार्यों और अंशु गुप्ता के व्यक्तित्व का स्केच हमारे आपके सामने रख देता है। 

जनसंचार की डिग्री और अर्थशास्त्र में एम ए की पढ़ाई करने वाले अंशु गुप्ता ने अपने पेशेवर जीवन की शुरूआत फ्रीलांस पत्रकार के तौर पर किया। सन 1998 में कारपोरेट जगत की नौकरी को लात मारकर श्री गुप्ता ने इस विचार के साथ गूंज की नींव डाली कि कपड़ों के जरिए गरीबों-असहायों की सेवा की जाए। गुंज के जरिए अंशु का काम आज के दौर में शहरी संपन्नता और ग्रामीण गरीबी के बीच बढ़ रहे अंतराल से मुकाबला करता है। कई मायनों में उनका कार्य परिवर्तनकारी रहा है। उन्होंने कथित हानिकारक शहरी अपशिष्ट को अपना हथियार बनाकर भारत के पिछड़े और दुरस्थ इलाकों में सड़क, पानी, पर्यावरण, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर व्यापक स्तर पर परिवर्तनकारी कार्य किए। शहरों के ये कथित अपशिष्ट न केवल नजरअंदाज़ किए गए मूलभूत जरूरतों को पुरा कर रहे हैं बल्कि ये आय बढ़ाने के लिए एक संसाधन के रूप में भी उभर रहे हैं। शहरी औऱ ग्रामीण भारत के बीच बढ़ रहे अंतराल को अपने अभिनव तरीके से पाटने के लिए अंशु ने अपने प्रयास को दाता के गौरव की बजाए दान लेने वाले की प्रतिष्ठा पर केंद्रित किया।

गूंज के साथ अंशु ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के मामले में निष्क्रिय शहरी और ग्रामीण जनता को अपनी समस्याओं को सुलझाने, अपनी जरूरतों को पुरा करने की दिशा में मुख्य हितधारक बनाया। उन्होंने ग्रामीण भारत के विकास और सशक्तिकरण के लिए संसाधनों को जरूरत मंदों तक पहुंचाने के लिए एक बेहतर पाइपलाइन तैयार की। अंशू ने शहरी लोगों में एक कारण के लिए ध्यानपूर्वक नियमित रूप से देने की आदत विकसित जिसको अपने अभिनव शैली के जरिए गूंज ने इस्तेमाल के लायक बना लिया। शहरों में गूंज को खारिज की गई हर चीज स्टेप्लर से लेकर औद्योगिक जेनरेटर तक के इस्तेमाल का गौरव प्राप्त है। सामग्रियों को ध्यान में रखकर अंशु ने दो असंबद्ध भारत को जोड़कर अपनी समावेशी जीत का रास्ता तैयार किया। अपनी बात को निरंतर और शक्तिशाली तरीके से कह पाने की ताकत के जरिए अंशु ने गूंज को मजबूती से स्थापित किया। वैश्विक विकास एजेंडे पर कपड़े और सेनेटरी नैपकीन जैसे अपेक्षित मुद्दों को मजबूती दिलाने में अंशु को अपने सोलह सालों के इस कार्य में अपने संवाद कौशल से बेहद मदद मिली। विश्व बैंक जैसी कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने उनके काम औऱ विचार को मान्यता देकर सम्मानित किया। अंशु के विचार, संवाद और कार्यों ने शहरी लोगों के मन में इस बात को स्थापित करने में सफलता हासिल की कि उनके उपयोग किए गए पुराने सामान कुछ लोगों को एक सात सौ फीट बांस का पुल बनाने की प्रेरणा दे सकता है। अंशु ने ये सफलता ग्रामीण भारत में वर्षों पुरानी श्रम दान की परंपरा को पुनर्जिवित करके हासिल किया। अपने प्रयासों से अंशु ने ग्रामीण भारत के लोगों में असहाय पीड़ित होने की भावना की बजाए स्थानीय प्रशासन से और अधिक की मांग करने वाला सशक्त परिवर्तनकारी होने की भावना भरी।

हालांकि अंशु का काम एक संगठन के तौर पर खड़ा हो चुका है लेकिन उनका मिशन रहा है अपने विचारों को फैलाना। उनका यही खुलापन उनके लिए साध्य औऱ साधन दोनों है अपने हितधारकों के साथ सहयोग और भागीदारी का संबंध बनाने के लिए। शहरों में हर वर्ग के लोगों मसलन घरेलु महिलाओं, छात्रों, युवा पेशेवरों, वरिष्ठ नागरिकों या कोई भी अन्य जो कुछ दे सकता है उनको अपने साथ अंशु जोड़ते हैं। इसी तरह गांवों में विभिन्न इलाकों के मद्देनजर खुले मन से गुंज गरीबी की विभिन्न समस्याओं और मुद्दों का हल खोजता है।

अंशु सहज सहानुभूति के जरिए लोगों को जोड़ते हैं। देने के कार्य को वो प्रतिष्ठित करते हैं। लोग कपड़े को दान स्वरूप न लेकर गौरवान्वित महसूस करते हैं। इसी तरह से स्कूलों की पुरानी सामग्रियां पुराने तरीके से वितरित करके देने की बजाए विभिन्न कार्यकलापों के आयोजन के बाद पुरस्कार के रूप में दिए जाते हैं। अपने कार्यशैली पर अंशु कहते हैं कि ग्रामीणों की प्रतिष्ठा उनके लिए सबसे अहम है। अंशु कहते हैं, “ आपने गांवों में कितने भिखारी देखे हैं ? मैं समझता हूं कि आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा एक ग्रामीण की सबसे बड़ी पूंजी होती है। गांवों में भिखारी नहीं होते हैं। भिक्षाटन शहरी प्रवृति है तो फिर हम ग्रामीणों के लिए काम करते वक्त चैरिटी के बारे में क्यों सोचते हैं? हम हमेशा उन्हें लाभार्थी क्यों कहते हैं? एक गरीब किसान हम जैसों को सबसे ज्यादा देने वाले होता है.. उनकी प्रतिष्ठा मायने रखती है। वो आपके पास नहीं आते हैं, आप उनके पास जाते हैं।

कुल मिलाकर अंशु ने सिविल सोसाइटी और विकास के वर्तमान मसौदे के रडार से बाहर जा कर कुछ मुलभूत जरूरतों को चिन्हित का है जिसकी पूर्ति वो कल्पनाशील तरीके से शहरी अपशिष्ट के जरिए करते हैं।

दरअसल जब गूंज के कार्यों की वजह से अंशु गुप्ता को रमन मैगसेसे अवार्ड देने की घोषणा हुई तो अचानक से सामाचार माध्यमों में हुई चर्चा की वजह से अंशु गुप्ता जानी पहचानी शख्सियत में तब्दील हो गए लेकिन गरीबों और असहायों के लिए उनकी ओर किए जा रहे कार्यों में उनका अब तक का सफर इतना आसान भी नहीं रहा। देहरादून में चार भाई बहनों के बीच एक मध्य वर्गीय परिवार में अंशु का जन्म हुआ। चौदह साल की आयु में ही उनके सर से उनके पिता जी का साया उठ गया। ज़ाहिर है सर से पिता का साया उठ जाने के बाद जीवन जरूरतो की पूर्ति के लिए हर संभव कोशिश करते रहने का क्रम तभी से शुरू हो गया। कक्षा बारहवीं के दौरान भीषण सड़क दुर्घटना का शिकार होने के बाद भी ग्रेजुएशन के दौरान 1991 में उत्तर काशी में आई भीषण बाढ़ के दौरान उन्होंने राहत सामग्री लेकर पीड़ितों की सेवा की। ग्रामीण भारत की समस्याओं को इस दौरान उन्होंने काफी करीब से महसूस किया।

कपड़े इकठ्ठे कर जरूरतमंदों में बांटने का विचार उन्हें तब आया जब एक बार वो अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार करने वाले एक शख्स के साथ दिल्ली के खूनी दरबाजा गए थे। अपने उस अनुभव के बारे में अंशु बताते हैं, “ एक बार दिसंबर की एक रात मैं उसके साथ एक अज्ञात शव को लेने खूनी दरबाजा गया था। उस व्यक्ति की मौत ठंड ठिठूर कर हो गई थी। उसके शरीर पर बस एक पतली सूती की कमीज थी।“ उसी वक्त अंशु को कपड़े इकठ्ठा कर जरूरतमंदों में बांटने का विचार आया।  1999 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ कर 67 इकठ्ठे किए हुए कपड़ों के साथ गुंज के काम की शुरूआत की। वो कहते हैं, “मैं इकठ्ठा किए हुए इन कपड़ों को जरूरतमंदों में चैरिटी के रूप में नहीं बांटता। चैरिटी लोगों की आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती है। यहीं से मेरे मन में काम के बदले कपड़े का विचार आया।“


गूंज अब तक 21 राज्यों में राहत औऱ बचाव का काम कर चुका है।

काम के बदले कपड़े के विचार के तहत गूंज ने अपनी एक शैली विकसित की जिसके ग्रामीण इलाकों में विकास कार्यों से जुड़े किसी काम को पुरा करने के एवज़ में ग्रामीणों के श्रम के बदले उन्हें कपड़ा दिया जाता है ताकि उनकी प्रतिष्ठा को चोट न पहुंचे। गूंज एक महीने में तकरीबन 70 हजार किलों सामान जरूरतमंदों को प्रदान करता है। एक हजार टन इस्तेमाल किए हुए कपड़े महीने में बंटवाता है। यही नहीं शहरों में उपयोग के बाद फेंक दिए गए अनेक सामान गरीबों के काम आते हैं। इन सबके बीच अंशु गुप्ता ‘ये महज़ कपड़े का एक टुकड़ा नहीं’ प्रोजेक्ट के तहत गांवों और झुग्गियों में किशोर युवतियों के बीच सेनेटरी पैड्स का वितरण करते हैं। ग्रामीण इलाकों में मासिक धर्म के दिनों में स्वचछता का अभाव कई बीमारियों को जन्म देता है। इस प्रोजेक्ट के तहत इस पर जागरूकता फैलाना और मासिक धर्म से जुड़े अंधविश्वास के खिलाफ युवतियों को जागरूक किया जाता है। अंशु गुप्ता कहते हैं इन युवतियों को जागरूक करना उन्हें बेहद अच्छा लगता है।

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