मदनलाल कुमावत का जन्म राजस्थान के चुरू जिले के बालमुकुंदपुरा गांव में 1964 में हुआ था। दैनिक मजदूरी कर अपना गुजर बसर करने वाले परिवार में जन्में मदनलाल एक भीषण दुर्घटना की वजह से शिक्षा दीक्षा भी ग्रहण नहीं कर पाए लेकिन मेधावी मदनलाल ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि कौशल के आधार पर थ्रेसर के मॉडल में परिवर्तन कर उच्च क्षमता का थ्रेसर बनाया और अपनी इसी एक सफलता के दम पर वो कुशल उद्यमी बन पाए। दिव्यांग मदनलाल ने अपनी कौशल से न केवल पुरे चुरू इलाके में पहली बार उच्च क्षमता का थ्रेसर बनाने में सफलता हासिल की बल्कि अपनी प्रतिभा के दम पर अपनी अपंगता को भी पराजित किया।
कुमावत के पिता जी दैनिक मजदूरी पर गांव में करने वाले एक बढ़ई थे। बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में मेधावी रहे कुमावत चौथी कक्षा के बाद एक दुर्घटना की वजह से आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सके। दुर्घटना के कारण कठिन श्रम कर पाने की असमर्थता की वजह से कुमावत ने दर्जी का काम सिखने की कोशिश की ताकि उन्हें हिलना डुलना कम पड़े। इसके साथ साथ उन्होंने अपने पिता जी से बढ़ई का काम भी सीखना चालु किया और समय समय पर अपने पिता जी की उनके काम में हाथ भी बंटाने लगे। थोड़े समय के बाद जब उनकी हालत थोड़ी ठीक हुई और दुर्घटना की कठिनाइयों से वो थोड़ा बहुत उबरने लगे तो उन्होंने पुरे समय बढ़ई का काम सीखना शुरू किया।
एक बार मदनलाल को उनके किसी परिचित ने पास ही के एक गांव में काम के लिए बुलाया जिसे पुरा करने में उन्हें पंद्रह से बीस दिन का वक्त लगा। इस काम को सफलतापूर्वक करने से उन्हें पहली बार एक बढ़ई के तौर पर पहचान स्थापित करने में मदद मिल पाई। इसके बाद उन्होंने पास ही में स्थित रामपुरा में जाकर बढ़ई के तौर पर काम करना शुरू किया। इसी क्रम में उन्हें मशीन के काम में दिलचस्पी पैदा हुई और उन्होंने पास ही में एक स्थित बागरू गांव में अपने ही एक गांववाले की मदद से इस काम को सीखने के लिए एक वर्कशॉप जाना शुरू किया। कुछ ही दिनों में उन्होंने कृषि कार्यों में उपयोग में आने वाले तकरीबन सभी उपकरणों के बारे में ठीक ठाक जानकारी हासिल कर ली थी। उनके लगन से प्रभावित हो वर्कशॉप के मालिक भी उन पर भरोसा करने लगे। इस काम में उन्हें इतना मजा आया कि उस वर्क शॉप में उन्होंने नौ साल काम करते हुए बिताया। इन नौ सालों में उन्होंने कुछ कृषि उपकरणों में अपनी कल्पनाशीलता के बल पर कुछ सुधार भी किए।
अब उन्होंने अपना वर्कशॉप खोलने की सोची। इसी क्रम में 1997 में उन्होंने दांता में अपना वर्क शॉप शुरू किया। उन्होंने कृषि उपकरण के तौर पर थ्रेसर और कुछ अन्य उपकरण बनाने शुरू किए। अपने वर्कशॉप में दिन भर में कम से कम 15-18 घंटे वो काम करते थे। कई बार उनकी पत्नी उनके इस कदर काम करने पर जब नाराज होतीं तो उनका सीधा सा जबाव होता उनके लिए काम करना उनकी पहली प्राथमिकता है। अस्सी और नब्बे के दशकों में राजस्थान के कृषि उपकरणों के निर्माता और वितरक पंजाब से थ्रेसर मंगाकर उसे स्थानीय स्तर पर बेचा करते थे। मदनलाल को इतने दिनों के काम के बाद ये आभास हो चुका था कि वो थ्रेसर और उससे जुड़ी अन्य सुविधाओं का निर्माण खुद कर सकते हैं। फिर उन्होंने एक बार खुद से ही थ्रेसर बनाने का बीड़ा उठाया। 20-30 दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद उन्होंने एक थ्रेसर बनाने में न केवल सफलता हासिल की बल्कि थ्रेसर की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार भी किए जिसका प्रदर्शन उपलब्ध थ्रेसरों की तुलना में बेहतर था। थ्रेसर निर्माण के क्रम में उन्हें इस बात का अहसास हुआ थ्रेसर की गुणवत्ता में वो और भी बेहतर सुधार कर सकते हैं लिहाज़ा वो इस विचार के साथ नए तरीके के थ्रेसर बनाने में जुट गए।
पिछले थ्रेसर बनाते वक्त मदनलाल ने देखा था कि थ्रेसर के घुमने वाले पुर्जे अच्छा खासा हवा उत्पन्न करते हैं इसलिए उन्होंने वर्तमान थ्रेसर के मॉडल में थोड़ा सा परिवर्तन कर उसमें एक इन बिल्ट ब्लोअर लगा कर उत्पन्न हवा एक जगह इकट्टा कर उससे अनाज की सफाई का इंतजाम कर दिया।.थ्रेसर के सुधार के क्रम पहले चरण में उन्होंने गाहने की प्रक्रिया के दौरान काटने वाली एक प्रणाली भी उसमें जोड़ी। उस वक्त बाजार में आने वाले बहु फसलीय थ्रेसरों में भारी या हल्के ढेर की कटाई करने की क्षमता नहीं थी। 1991 में मदनलाल ने थ्रेसर की प्रणाली में संशोधन किया और ब्लोअर की गति को इस हद तक नियमित किया कि वो किसी भी फसल के ठंडल आदि के थ्रेसर के अनुकूल हो जाए। 1997 तक आते आते उन्होंने थ्रेसर मशीन की ड्रम और बीटर को नियमित कर थ्रेसर की लंबाई भी बढ़ाई ताकि मुख्य हिस्से पर वजन कम किया जा सके। उन्होंने डीजायन को भी इस तरह से परिवर्तित किया कि थ्रेसर के उपकरणों को जल्दी जल्दी बदलने की नौबत न आए। थ्रेसर को भी विभिन्न फसलों के अनुकूल बनाने की उन्होंने भरसक कोशिश की। उन्होंने थ्रेसर में इस तरह के कल पुर्जे इस्तेमाल किए कि एक फसल से दुसरे फसल में थ्रेसर को उपयोग के लायक बनाने में बहुत ज्यादा वक्त न लगे और दस से पंद्रह मिनट में थ्रेसर दूसरे फसलों पर उपयोग के लिए तैयार हो जाए। 2005 में उन्होंने थ्रेसर के संरचना में और भी बदलाव किए। अब तक मूंगफली के लिए अलग तरह के थ्रेसर उपयोग में लाए जाते थे। मदनलाल ने अपने थ्रेसर की संरचना में थोड़ा सा बदलाव करने इसे मूंगफली के लिए भी तैयार कर दिया। इस परिवर्तन के बाद ये हुआ कि उपलब्ध थ्रेसर को ही दो से ढाई घंटे के वक्त में मूंगफली के लिए भी तैयार किया जा सकता था। इस वक्त तक मदनलाल सिर्फ एक तरह की उच्च क्षमता वाला (तकरीबन 20-22 क्वींटल प्रति घंटे की क्षमता) थ्रेसर ही बनाते थे। फिर उन्हें लगा कि किसान उनकी थ्रेसर की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। तब उन्होंने दो कम क्षमता (7-15 क्वींटल प्रति घंटा) वाली थ्रेसर का निर्माण किया जिसका उन्हें किसानों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली औऱ इलाके के बड़े बाजार पर उनका कब्जा हो गया। कुमावत को थ्रेसर की गुणवत्ता में सुधार के लिए वर्ष 2001 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने सम्मानित भी किया। यही नहीं विदेशी पत्रिका फोर्ब्स ने हाल ही में उन्हें भारत के सात शक्तिशाली ग्रामीणों की सूची में सम्मिलित करके उनका मान बढ़ाया है।
आज अपने थ्रेसर की मदद से वो खाद्यान्न फसलों, तिलहन और दलहन तीनों पर अपनी थ्रेसर की मदद से काम कर सकते हैं। उनके थ्रेसर में सिर्फ दो बेयरिंग ही होता है जिसे आसानी से बदला भी जा सकता है।

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