इन्होंने कपास की चुनाई की लागत प्रति किलो एक रूपये से कम कर प्रति बीस किलो पर एक रूपये तक कर दिया।

अंग्रेजी की एक प्रसिद्ध कहावत है एक जहाज बंदरगाह में सुरक्षित है लेकिन बंदरगाह में सुरक्षित खड़े रहने के लिए जहाज नहीं बने होते हैं। ये कहावत उनके उपर सबसे ज्यादा मुफीद बैठता है जो जीवन में लीक पर न चलकर उन रास्तों पर जिन पर पहले कम ही लोग चले हों ऐसा कुछ खोजने निकल पड़ते हैं जो बहुतों के लिए उपयोगी होता है दूसरों की सहायता करता है। बहुत से कर्मचारी जो अपनी नौकरी की एकरसता से परेशान हो जाते हैं, वो कुछ हटकर करने के ख्वाहिशमंद होते हैं। लेकिन कितने होते हैं ऐसे जो अपनी नौकरी की एकरसता, निरंतर आने वाली मासिक आय की मजबूरी को छोड़कर अलग हटकर कुछ करने को निकलते हैं

एक किसान, मनसुखभाई पटेल का जीवनानुभव बहुत के लिए एक मिसाल होने के साथ साथ ही उनके लिए प्रोत्साहन भी हो सकता है।

अहमदाबाद, स्थित नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के उपाध्यक्ष प्रोफेसर अनिल गुप्ता बताते हैं कक्षा नौंवी के बाद स्कूल छोड़ देने वाले श्री पटेल का जन्म बहुत ही गरीब परिवार में हुआ था। उनको कपास की चुनाई के लिए एक अत्याधुनिक मशीन बनाने का श्रेय जाता है जिसने गुजरात के कपास की खेती में क्रांति ला दी

बेहतर आय

आज राज्य के कई कपास मिल इस मशीन का इस्तेमाल कर रहे हैं। मशीन ने कपास की चुनाई की लागत एक रुपये प्रति किलो से कम करके बीस किलों पर एक रुपया कर दिया। इससे कपास की खेती करने वाले किसानों को अच्छी आय हो पाई और मिल की भी गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी हुई।

वर्षा आधारित कपास ( वी : 797 किस्म) के गोले की मशीन से चुनाई का विचार उन्हें एक बार अपने गांव जाने पर आया। अपने इस अनुभव का जिक्र करते हुए श्री पटेल कहते हैं, एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने की वजह से जो छोटे स्तर पर कपास की भी खेती करते थे, मैं इस पर आने वाले खर्च और उत्पादन में होने वाली देरी से परिचित था। कपास का इस किस्म में बहुत ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है औऱ रूखे एवं सूखे मौसम में भी इसकी वृद्धि ठीक ठाक होती है।

हालांकि अधिकांश संकर किस्मों में कपास के गुच्छे होते हैं जिन्हें कपास के पौधें से हाथ से तोड़ कर अलग करना पड़ता है जबकि देशी किस्मों में कपास की फली होती है जिन्हें बहुत आसानी से नहीं खोला जा सकता है। कपास के गुच्छे को बाहर निकालने के लिए फली को हाथ से उठाकर उसे चीरना होता है। थकाऊ और उबाऊ प्रक्रिया होने के नाते अधिकांशत इस काम में महिलाएं और बच्चे ही लगे होते हैं।

कटाई का मौसम

कटाई के सीजन में अधिकांश बच्चे स्कूल जाने की बजाए कपास के गुच्छे खेतों से चुनने के लिए दिन में मजदूरी करते हैं। कई महीनों तक अपनी योजना पर विचार करने के बाद श्री पटेल इस बात पर आश्वस्त हो गए थे कि वो इस तरह के मशीन का निर्माण कर सकते हैं जो हल्के खुले कपास के बीज कोष से कपास की चुनाई कर सके।  

अपने पहले मॉडल को तैयार करने में उन्हें दो साल का वक्त लगा। सन 1994 में उन्होंने पहली बार खुद से डिजायन करके तैयार किए हुए मशीन का प्रदर्शन किया।

 प्रस्तावों की बाढ़ आ गई

गांव में मशीन के प्रदर्शन को देखकर तकरीबन हर किसी को ये भरोसा हो गया कि इस थकाऊ प्रक्रिया को मशीन की मदद से आसानी से किया जा सकता है।

बावजुद इसके की मशीन का प्रदर्शन श्री पटेल के आशानुरूप नहीं था, प्रदर्शन के बाद हुई बैठक में उन्हें कम से कम पचास मशीन बनाने का आर्डर मिला।

श्री पटेल बताते हैं मशीन की वास्तविक आपूर्ति आसान थी। हालांकि प्रदर्शन के दौरान ग्राहक मशीन से बेहद प्रभावित हुए थे लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में मशीन के प्रदर्शन से ग्राहक संतुष्ट नहीं हो पा रहे थे। शिकायतों के साथ सभी मशीनें लौट आईं।  आखिरकार ये बात सामने आई कि मशीन की खराबी एक छोटी सी तकनीकी समस्या की वजह से थी। मैंने मशीन के पैसे जो ग्राहकों से लिए थे वो मुझे लौटाने पड़े और मुझे वित्तीय परेशानी का सामना करना पड़ाcotton 1

लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अगले तीन सालों तक उन्होंने मशीन की बनावट में कुछ और बदलाव किए। आखिरी साल में उन्होंने मशीन में धूल इकठ्ठा करने और एक स्वचालित संभरण प्रणाली जोड़ा।

अमेरिकी पेटेंट

उन्होंने मशीन को एक जगह से दूसरी जगह तक आसानी से ले जा सकने के लिए मशीन में पहिए लगाने की जगह बनाई। इस मशीन के लिए उन्हें भारत और अमेरिका से पेटेंट मिल गया। प्रो गुप्ता कहते हैं ग्रामीण लोगों को अन्वेषी होने की कोशिश करनी चाहिए। श्री पटेल की ही तरह कई अन्वेषी किसान हैं जो अपनी थोड़ी सी कल्पनाशीलता और घंटों की मेहनत के बाद अपने पेशे का काम आसान करने की राह बनाई है

विस्तृत जानकारी के लिए संपर्क करें श्री मनसुखभाई पटेल, चेतक इंडस्ट्री, 113, जीआईडीसी इंडस्ट्रीयल इस्टेट, हंसलपुर, विरांगम, अहमदाबाद, गुजरात, मोबाइल – 9824089035, फोन: 02715-235108.

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